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Nov 10, 2019

Ayodhya_Verdict: पांच सदी पुराना है अयोध्या मामला, जानिये कब क्या-क्या हुआ. #Ram_Mandir #Babri_Masjid

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क्या आप जानते है अयोध्या का मामला 5 सदी पुराना है. यह मामला तब का है जब से माना जाता है कि बाबर ने मंदिर तुड़वाकर मस्जिद का निर्माण करवाया था।  हमारे देश की आज़ादी के बाद से ही इस मामले ने देश की राजनीती को काफी प्रभावित किया है. अयोध्या मामले के कारण अभी तक देश में काफी दंगे हुए , हिंसा हुई , लोग मारे गए, जांच के लिए जांच आयोग की टीम गठित हुई , लोगो को आरोपी भी बनाया गया , और अब आखिरकार 9 नवम्बर 2019 को देश की सर्वोच्च अदालत में इस मामले पर फैसला सुना दिया गया और विवाद को ख़त्म कर दिया गया.

आज हम इस पोस्ट में आपको बताएँगे कि पांच सदी पुराने इस मामले में कब क्या हुआ .

बाबर ने मंदिर ने तुड़वाकर मस्जिद बनवाई 
कहा जाता है कि सन 1528-29 में बाबर ने विवादित स्थान पर मंदिर तुड़वाकर मस्जिद बनवा दी। इस स्थान पर हिन्दू अपने आराध्य देवता भगवन श्री राम का जन्म स्थान मानते है। ऐसे कहा जाता है कि मुगल राजा बाबर के सेनापति मीर बाकी ने यहां मंदिर तुड़वाकर मस्जिद बनवाई थी जिसे बाबरी मस्जिद नाम दिया गया। बाबर 1526 में भारत आया था और 1528 तक उसका साम्राज्य अवध जिसे अब अयोध्या के नाम से जाना जाता है, तक पहुंच गया। इसके बाद तीन सदियों का इतिहास किसी भी ओपन सोर्स पर उपलब्ध नहीं है।

अयोध्या में जब पहली बार दंगे हुए थे 
ऐसा कहा जाता है कि हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच पहली बार 1853 में हिंसक घटना हुई थी। उस समय निर्मोही अखाड़े ने दावा करते हुए यह बात कही कि "जहाँ पर अभी मस्जिद है वहाँ पहले मंदिर हुआ करता था, जिसे बाबर के शासनकाल में गिरा दिया गया था ". और इसी मुद्दे को लेकर अवध में अगले 2 सालो तक भयानक हिंसक घटनाएं होती रही. जबकि फैजाबाद जिला गजट 1905 के अनुसार सन 1855 तक हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही इस इमारत में पूजा व इबादत करते रहे।

अंग्रेजो ने इस जगह को 2 भागो में बाँट दिया 
जैसा कि हम जानते है सन 1857 में आज़ादी के लिए पहला आंदोल हुआ जिसे हम प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम से भी जानते है. 1857 में इस आंदोलन के कारण यह मामला थोड़ा शांत हो गया था।  और इसके बाद सन 1859 में अंग्रेजो ने इस मस्जिद के आगे एक दीवार बनवा दी जिससे यह परिसर 2 भागों में विभाजित हो गया।  बाहर हिन्दूओ को पूजा-प्रार्थना करने की जबकि अंदर मुसलमानो को इबादत करने की अनुमति दी गई।


जिला अदालत में पहुंचा यह विवादित मामला 
अब मंदिर-मस्जिद का यह विवादित मामला इतना गंभीर हो गया था कि सन 1885 में यह मामला पहली बार कोर्ट में  पंहुचा। साधू-महंत रघुवर दास ने फैज़ाबाद कोर्ट में याचिका दाखिल की और बाबरी मस्जिद की जगह मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। हालांकि बाद में कोर्ट ने यह अपील ठुकरा दी और इसके बाद तारीख पर तारीख मिलने लगी और सिलसिलेवार यह क्रम चलते गया।
दंगो में क्षतिग्रस्त हुई थी मस्जिद की दीवार और गुम्बद
जैसे-जैसे तारीखों का क्रम आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे यह विवाद और भी गहराता गया. सन 1934 में फिर दंगे हुए और इस बार मस्जिद के चारो तरफ की दीवार और गुम्बद को नुकसान हुआ।  इसके बाद अंग्रेजो ने अर्थात ब्रिटिश सरकार ने इस क्षतिग्रस्त हिस्से का पुनर्निर्माण करवा दिया।

सरकार ने इस स्थल पर लगवा दिया ताला 
भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गई।  कहा जाता है कि ये मूर्तियां हिन्दुओं ने मस्जिद में रखवाई। ऐसे में दोनों पक्षों में भयानक विवाद व हिंसा हुई।  मुसलमानो ने यहां पर नमाज़ पढ़ना बंद कर दिया। अब्द दोनों पक्षों की ओर से अदालत में याचिका दायर की गयी। सन 1949 में इस स्थल को विवादित मानकर तात्कालीन सरकार ने इस स्थान पर ताला लगवा दिया।

जब भगवान राम की पूजा की इज़ाज़त मांगी गई 
गोपाल सिंह विशारद ने 1950 में भगवान राम की पूजा करने के लिए फैज़ाबाद कोर्ट से इज़ाज़त मांगी। महंत रामचंद्र दास ने मस्जिद में भगवान राम की पूजा जारी रखने के लिए याचिका दायर की। और इसी दौरान मस्जिद को ढांचा के रूप में सम्बोधित किया गया।

जब दोनों पक्षों ने विवादित स्थल के हक के लिए याचिका दायर की
सन 1959 से 1961  के बीच दोनों पक्षों ने विवादित स्थल पर अपने मालिकाना हक़ के लिए याचिका दायर की।  निर्मोही अखाड़े ने इस स्थल को हिन्दुओं का हक़ मानते हुए याचिका दायर की जबकि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक़ के लिए मुकदमा दायर किया।

राम जन्मभूमि मुक्ति के लिए समिति का गठन हुआ 
हिन्दुओं ने विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया ताकि राम जन्मभूमि को मुक्त कराया जा सके। इसके साथ ही गोरखपुर के गोरखनाथ धाम के महंत अवैध्य नाथ ने राम जन्मभूमि यज्ञ समिति बनाई ताकि राम जन्मभूमि को शीघ्रातिशीघ्र मुक्त कराया जा सके। महंत अवैध्य नाथ ने हिन्दुओ से अपील की कि उसी पार्टी को वोट दें जो हिन्दुओ के पवित्र स्थानों को मुक्त कराए। बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया।


ताला खोलने का आदेश जारी हुआ और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनाई गई 
इसप्रकार यह मामला दिन पर दिन गंभीर होता गया दोनों पक्ष अपने हक़ के लिए लड़ाई लड़ने लगे। कभी हिन्दू पक्ष तो कभी मुस्लिम पक्ष इस विवादित स्थान को अपना मालिकाना हक़ बताता।  ऐसे में यह मामला कोर्ट में कई सालों से चलता रहा। 1986 में जिला कोर्ट ने आदेश दिया की विवादित स्थल पर लगा ताला खोला जाए और पूजा-प्रार्थना के लिए हिन्दुओ को इज़ाज़त दी जाए।  ऐसे में मुस्लिम पक्ष नाराज़ हो गया और इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया।
विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर का शिलान्यास किया 
अयोध्या के राम मंदिर मामले में भारतीय जनता पार्टी ने विश्व हिन्दू परिषद को अपना समर्थन दिया। विश्व हिन्दू परिषद के नेता देवकी नंदन अग्रवाल ने रामलला की तरफ से मंदिर के हक़ के लिए कोर्ट में याचिका दायर की। साथ ही सन 1989 में विश्व हिन्दू परिषद ने मस्जिद से कुछ ही दुरी पर राम मंदिर का शिलान्यास किया।

जब लालकृष्ण आडवाणी गिरफ्तार हुए 
1990 में भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने हिन्दुओं को इस महत्वपूर्ण मुद्दे से अवगत कराने के लिए गुजरात के सोमनाथ से लेकर उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा की शुरआत की।  इस दौरान हज़ारों कार सेवक अयोध्या में एकत्रित हुए। फलस्वरूप गुजरात , कर्नाटक , आँध्रप्रदेश व उत्तरप्रदेश में दंगे भड़कना शुरू हो गए थे. स्थिति को देखते हुए लालू प्रसाद यादव ने बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा रुकवाकर उनको गिरफ्तार करवा लिया। ऐसे में देश के कई हिस्सों से हिन्दुओं द्वारा मंदिर निर्माण के लिए लाखों ईटें अयोध्या पहुंचाई गई। आडवाणी की गिरफ्तारी के दौरान देश में प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार थी।  इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने वीपी सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया।

जब पहली बार अयोध्या में हुआ था गोलीकांड 
1990 में पहली बार अयोध्या में कारसेवा हुई। 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवको ने मस्जिद पर चढ़कर झंडा फहराया था।  इस समय उत्तर प्रदेश में  मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। मुलायम सिंह यादव की सरकार नें कारसेवको पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। गोली चलने से 5 कार सेवको की मौत हो गई। कार सेवको की मौत के बाद मामला और भी गंभीर हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस मामले को सुलझाने का काफी प्रयास किया किन्तु सफलता नहीं मिल पाई।


उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी 
1990 में हुए गोलीकांड के बाद जब 1991 में उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए तब मुलायम सिंह यादव की सरकार हार गई और भारतीय जनता पार्टी को इस चुनाव में शानदार जीत मिली। और भाजपा ने अपनी सरकार बना ली।

जब बाबरी मस्जिद ढहा दी गई और देश में दंगे शुरू हुए 
30-31 अक्टूबर 1992 को धर्मसंसद में कारसेवा की घोषणा की गई। इस दौरान उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याणसिंघ ने मस्जिद की हिफाज़त के लिए कोर्ट में हलफनामा दिया। देश भर भयानक दंगे होने लगे। देशभर से हज़ारो कार सेवक अयोध्या पहुंचे और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को तोड़कर एक अस्थाई राम मंदिर का निर्माण किया गया. पुरे देश में दंगे इस कदर भड़क गए कि 2000 से अधिक लोगो की मौत हो गई। इसके बाद 16 दिसंबर 1992 को मस्जिद ढहाने की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन हुआ। जज एमएस लिब्रहान की अध्यक्षता में जांच शुरू की गई।  और 1994 में बाबरी मस्जिद विंध्वंस का केस इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में शुरू हुआ।


मस्जिद ढहाने वाले 49 लोगो को दोषी बनाया गया 
 बाबरी मस्जिद विध्वंस केस की सुनवाई कर रही विशेष अदालत ने सितम्बर 1997 में 49 लोगो को दोषी ठहराया गया।  इन 49 दोषियों में भारतीय जनता पार्टी के कुछ बड़े नेताओ के भी नाम थे। बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर तनाव और अधिक बढ़ गया।  और सन 2001 में विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर बनाने की तारीख की घोषणा तक कर डाली। विश्व हिन्दू परिषद ने कहा की मार्च 2002 में राम मंदिर का निर्माण किया जाएगा।

जनवरी-फरवरी 2002: मामला सुलझाने के लिए वाजपेयी ने हस्तक्षेप किया 
वाजपेयी सरकार ने अयोध्या मामले को सुलझाने के लिए एक समिति का गठन किया।  एक वरिष्ठ अधिकारी जिनका नाम शत्रुघ्न सिंह था उनको हिन्दू और मुस्लिम पक्ष के नेताओं से बातचीत कर मामले को सुलझाने के लिए नियुक्त किया गया। इस दौरान उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव आ गए।  भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर को अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल करने से साफ़ इनकार कर दिया। 15 मार्च 2002 से विश्व हिन्दू परिषद ने मंदिर निर्माण का कार्य शुरू करने की घोषणा कर दी।  सैकड़ो हिन्दू कार्यकर्ता इस दौरान अयोध्या पहुंच गए।  लेकिन फरवरी 2002 में जब कई सारे कार्यकर्ता जिस ट्रैन से लौट रहे थे, गोधरा पहुंचते ही उस ट्रैन में आग लगा दी गई। इसमें 58 हिन्दू कार्यकर्ताओं की मौत हो गई।

13 मार्च 2002 को सुप्रीम कोर्ट का आया आदेश 
अब स्थिति काफी बेकाबू हो चुकी थी। स्थिति को देखते हुए  13 मार्च 2002 को सुप्रीम  कोर्ट का आदेश आया कि अयोध्या में इस वक्त जैसी भी स्थिति है उसे वैसा ही रखा जाए।  किसी भी पक्ष को सरकार द्वारा अधिग्रहित जमीन पर शिला पूजन की अनुमति नहीं होगी। सरकार ने कहा कोर्ट का जो भी फैसला आएगा उसका पालन किया जावेगा।

15 मार्च 2002 : सरकार को सौपी गई शिलाएं 
इस दौरान केंद्र सरकार और विश्व हिन्दू परिषद के बीच एक समझौता हुआ. इस समझौते में यह निर्णय लिया गया कि विश्व हिन्दू परिषद मंदिर परिसर से बाहर सरकार को शिलाएं सौपेगी। राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास एवं विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल की अगुवाई में 800 कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी को शिलाएं सौपी। अप्रैल 2002 में हाईकोर्ट में तीन जजों की पीठ ने अयोध्या में विवादित स्थान के मालिकाना हक़ को लेकर सुनवाई प्रारम्भ की।

विवादित स्थान के नीचे खुदाई शुरू हुई 
मार्च 2003 से लेकर अगस्त 2003 तक विवादित स्थान के नीचे पुरातत्व विभाग ने खुदाई  की। खुदाई के दौरान मस्जिद के नीचे से मंदिर से मिलते-जुलते अवशेष होने के प्रमाण मिले। इसके बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मांगी की हिन्दुओं को विवादित स्थल पर पूजा-पाठ करने की अनुमति दी जाए।  लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका क्युकी कोर्ट ने  केंद्र सरकार की यह बात नहीं मानी। मई 2003 को, बाबरी मस्जिद गिराए जाने के आरोप में सीबीआई ने उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी समेत 8 लोगो को के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किये। इस दौरान कांची पीठ के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती ने जून 2003 में मामला सुलझाने का प्रयास भी किया उन्होंने कहा कि एक माह के अंदर इस विवादित मामले को सुलझा लिया जाएगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया।

विश्व हिन्दू परिषद ने सरकार से अपील की कि  राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए लेकिन तात्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अगस्त 2003 में विश्व हिन्दू परिषद की यह अपील ठुकरा दी और कहा कि इस प्रकार का कोई विधेयक नहीं लाया जाएगा।

2004 :लालकृष्ण आडवाणी ने अस्थाई राम मंदिर में पूजा की 
जुलाई-अगस्त 2004 में लालकृष्ण आडवाणी ने अस्थाई तौर पर बनाए गए मंदिर में पूजा अर्चना की और कहा कि राम मंदिर का निर्माण जरूर किया जाएगा।  इस दौरान जुलाई में ही शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सुझाव दिया था कि ये जो विवादित स्थान है यहां पर मंगल पांडे के नाम पर कोई राष्ट्रिय स्मारक बना दिया जाए।

जनवरी - जुलाई 2005 : जब हुआ अयोध्या में आतंकी हमला 
6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने की कथित भूमिका के मामले में लालकृष्ण आडवाणी को 2005 में अदालत में तालब किया गया।  2005 में ही अयोध्या में आतंकी हमला भी हुआ। 5 आतंकियों ने मिलकर इस हमले को अंजाम दिया था. वैसे पांचो आतंकियों सहित 6 लोग इस हमले में मारे गए। अगली बार फिर से लालकृष्ण आडवाणी को कोर्ट में [28 जुलाई 2005 को रायबरेली की एक अदालत में] पेश होने को कहा गया।  क्युकी उन पर बाबरी मस्जिद गिराने के दौरान भड़काऊ भाषण देने का आरोप था।  बाद में कोर्ट ने उन पर आरोप तय भी किये। 4 अगस्त 2005 को 4 लोगो को न्यायिक हिरासत में भेजा गया।

बाबरी मस्जिद को ढहाना एक मिलीभगत थी 
20 अप्रैल 2006 को कांग्रेस की सरकार ने लिब्रहान आयोग से कहा कि बाबरी मस्जिद को एक सुनियोजित तरीके से एक प्लानिंग के तहत ढहाया गया। कांग्रेस सरकार ने कहा कि बाबरी मस्जिद को ढहाने में भाजपा , शिवसेना , बजरंग दल एवं आरएसएस इन सभी की मिलीभगत थी। इन सभी ने मिलकर ही बाबरी मस्जिद को एक सुनियोजित तरीके से ढहाया है।

बुलेटप्रूफ कांच का घेरा बनाने का प्रस्ताव 
2006 में कांग्रेस सरकार ने विवादित स्थल पर बने अस्थाई मंदिर के चारो ओर बुलेटप्रूफ कांच का घेरा बनाने के लिए कोर्ट में प्रस्ताव रखा ताकि विवाद और आगे न बढे।  इस प्रस्ताव का मुस्लिम पक्ष ने पुरजोर विरोध किया और मुस्लिम पक्ष ने कहा कि कोर्ट ने पहले ही विवादित स्थल को यथास्थिति रखने का आदेश दिया हुआ है अतः बुलेट प्रूफ कांच का घेरा नहीं बनाने दिया जावे।

नेहरू -गाँधी परिवार का प्रधानमंत्री होता तो मस्जिद नहीं गिरती 
19 मार्च 2007 को राहुल गाँधी ने चुनावी केम्पेन के दौरान अपने भाषण में यह कह दिया कि यदि नेहरू या गाँधी परिवार का प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद नहीं गिरती।  राहुल गाँधी के इस बयान के बाद देश की राजनीति काफी गरमा गई थी।  उनके इस बयान पर कई राजनैतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रियाएं दी थी.
लिब्रहान आयोग ने जांच रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौपी
बाबरी मस्जिद विध्वंस केस की जांच के लिए गठित की गई लिब्रहान आयोग ने 17 वर्षो बाद 2009 में अपनी जांच रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को सौपीं।  इसी वर्ष 7 जुलाई को उत्तरप्रदेश सरकार ने भी यह माना कि अयोध्या मामले से जुडी 23 फाइलें सचिवालय से गायब है. इसके बाद 24 नवंबर को लिब्रहान आयोग की जांच रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश हो गई जिसमें अटलबिहारी वाजपेयी एवं भारतीय मिडिया को दोषी माना गया। जबकि नरसिंह राव को क्लीन चिट दी गई। बाबरी मस्जिद विध्वंस केस लालकृष्ण आडवाणी और कुछ अन्य नेताओ के खिलाफ मुकदमा चलाने को लेकर पंरिक्षण याचिका दायर की गई थी जो कि 20 मई 2010 को ख़ारिज कर दी गई।


अयोध्या केस में सुनवाई पूरी हुई 
8 सितंबर 2010 को हाईकोर्ट ने 24 सितंबर को फैसला सुनाने की बात कही, जबकि 28 सितंबर को फैसला टालने की अर्जी हैककोर्ट द्वारा खारिज की गई।

कोर्ट का फैसला : तीन हिस्सों में बाँट दिया गया विवादित 
30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अपना फैसला सुना दिया और विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बाँट दिया गया।  एक हिस्सा हिन्दुओं को, दूसरा हिस्सा मुसलमानो को जबकि तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाईं 
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ 14 अपीलें दाखिल हुई। अतः 9 मई 2011 को सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी।

21 मार्च 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने लालकृष्ण आडवाणी,मुरली मनोहर जोशी ,उमा भारती सहित कई अन्य बीजेपी एवं आरएसएस के नेताओ के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया।  साथ ही यह भी कहा गया कि अयोध्या में विवादित स्थल के मामले को आपसी सहमति से सुलझाया जाए। लेकिन फिर भी काम नहीं बना।

जब वसीम रिजवी ने कहा - "विवादित स्थल पर राम मंदिर बने"
8 नवंबर 2017 को शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वासिम रिजवी और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मुलाक़ात हुई। इस मुलाक़ात के बाद शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वासिम रिजवी ने बड़ा बयान दिया। रिजवी ने कहा कि -"विवादित स्थल पर राम मंदिर बनना चाहिए और वहा से दूर हटकर मस्जिद बननी चाहिए ". 16 नवंबर 2017 को आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने मामले को सुलझाने की कोशिश की।  उन्होंने सभी पक्षों से अलग अलग मुलाक़ात की लेकिन फिर भी बात नहीं बन पाई।  इसके बाद जब कोर्ट में अगली सुनवाई हुई तब कोर्ट ने 8 फरवरी 2018 तक सभी दस्तावेज पुरे करने की बात कही ताकि इस मामले पर फैसला जल्दी से जल्दी सुनाया जा सके।

नियमित सुनवाई की अपील हुई खारिज 
वरिष्ठ वकील जो कि सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से वकील थे उन्होंने 8 फरवरी को सुन्नी वक्फ बोर्ड की और से पक्ष रखते हुए नियमित सुनवाई करने की अपील की लेकिन उनकी यह अपील खारिज हो गई। साथ ही 29 अक्टूबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जल्द सुनवाई की याचिका ठुकराते हुए केस जनवरी 2019 तक के लिए ताल दिया।

जब अयोध्या में शिवसेना का कार्यक्रम हुआ 
24 नवंबर 2018 को अयोध्या में शिवसेना ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में हज़ारो हिन्दू कार्यकर्ता एकत्रित हुए। कार्यक्रम में शिवसेना को केंद्र की मोदी सरकार को जमकर कोसा और खरी -खोटी सुनाई।  शिवसेना ने कहा की केंद्र सरकार कुम्भकरण की तरह पिछले 4 साल से सो रही है।  कुम्भकर्ण भी 6-6 महीने सोता था इसी प्रकार केंद्र सरकार भी सोई हुई है. शिवसेना ने कहा कि मैं यहां किसी प्रकार की कोई लड़ाई करने नहीं आया हु मैं तो केंद्र सरकार को जगाने आया हु। जो वादा बीजेपी और मोदी सरकार ने जनता से किया था उसे पूरा करना चाहिए। आइये हम सब मिलकर राम मंदिर का निर्माण करते है। 


विश्वहिंदू परिषद की अगुवाई में अयोध्या में धर्म सभा हुई 

25 नवंबर 2018 को अयोध्या में वीएचपी के नेतृत्व में एक धर्मसभा हिन्दुओ द्वारा आयोजित की गई। धर्मसभा में संत रामभद्राचार्य ने कहा कि पांच राज्यों में चुनावों के कारण तारीख का एलान नहीं हो पा रहा है। अब करो या मारो का समय आ गया है।  देश का बहुसंख्यक समाज अयोध्या में जल्द ही राम मंदिर निर्माण पूरा होते देखना चाहता है।

जब पीएम मोदी ने कहा - फैसला कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद लेंगे
1 जनवरी 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल के प्रथम साक्षात्कार मे संसद में, अध्यादेश लाने के सवाल पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अभी यह मामला कोर्ट में है और अपने अंतिम चरण में है।  कोर्ट में इस मामले पर कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो भी फैसला आता है उसके बाद जो भी सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है , सरकार अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाएगी। 8 मार्च 2019 को कोर्ट ने इस मामले पर फैसला न सुनाते हुए मध्यस्थता के छोड़ा और इसके लिए 8 सप्ताह का वक्त दिया कि 8 सप्ताह में यह मामला आपस में सुलझा लिया जाए। लेकिन 8 सप्ताह के बाद भी अगस्त 2019 में मध्यस्थता पैनल यह मामला नहीं सुलझा पाई।

6 अगस्त 2019 से अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई प्रारम्भ हुई। 16 अक्टूबर 2019 तक सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले पर सुनवाई पूरी हो गई लेकिन कोर्ट ने अपना फैसला न सुनाते हुए फैसले को सुरक्षित रखा। और आखिरकार 9 नवंबर को इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया। यह फैसला राम मंदिर के पक्ष में गया।  कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े की अर्जी खारिज करते हुए विवादित स्थल रामलाल के हक की मानी गई।  जबकि मस्जिद के लिए अयोध्या में ही अलग से 5 एकड़ जमींन देने का आदेश दिया। मस्जिद के लिए जमीं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी उत्तरप्रदेश की योगी सरकार  को सौपी गई. इस फैसले के बारे में और भी रोचक बाते जानने के लिए यहां क्लिक करें। 

यह जानकारी आजतक से ली गई है